हमारे बारे में


— हमारा लक्ष्य

हमारा यह प्रयास समाज के इतिहास को जानने, समझने के साथ-साथ उन तमाम समाज बंधुओ तक पहुँचना  भी है, जिससे कि समाज की सामाजिकता, संस्कृति एवं रिश्तो- संबंधों की प्रगाढता की नवीन परिभाषा को और अधिक बेहतर रूप से समझा जा सके । यह तभी संभव है जब आपका यथेष्ट अपेक्षित प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष सहयोग, मार्गदर्शन हमें सतत प्राप्त होता रहेगा।

— हमारी दृष्टि

हमारा यह प्रयास समाज के इतिहास को जानने, समझने के साथ-साथ उन तमाम समाज बंधुओ तक पहुँचना  भी है, जिससे कि समाज की सामाजिकता, संस्कृति एवं रिश्तो- संबंधों की प्रगाढता की नवीन परिभाषा को और अधिक बेहतर रूप से समझा जा सके । यह तभी संभव है जब आपका यथेष्ट अपेक्षित प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष सहयोग, मार्गदर्शन हमें सतत प्राप्त होता रहेगा।


किराड़-किरात समाज

किराड़-किरात  मूलतः एक ही जाति के समानार्थी शब्द हैं| एक  सामाजिक मनुष्य के लिए अपने समाज व जाति का आरंभ, उद्भव एवं विकास तथा उसकी क्षेत्रीय रहवासिता तथा कार्यशीलन उद्यमिता को जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंग्रेजो के शासन काल एवं पूर्ववर्ती राजशाही कालखंड में लिखे गये ऐसें समाज ग्रंथो में उपलब्ध शासकीय गँजेटियरो से स्पष्ट होता है कि  ‘किराड’ जाति  का आपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है । हम सब वंशज आज यह जानकर गौरवान्वित महसूस करते है कि  हमारी पहचान का वर्णन हर कालखंड के इतिहास में किसी न किसी विशिष्ट पहचान के रूप में दर्ज रहा है। इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों के आलेख, शोधग्रंथों में राजस्थान के जोधपुर, बाड़मेर के किराडू, किरातकोट या किराटकूट (किराडू) से लेकर विक्रम संवत ९५६ से ९८१ तक के इतिहासकाल में किराड, किरात, किरार, धाकड़ जाति का शोर्यपूर्ण इतिहास दर्ज है। समय के साथ जाति वर्ग का फैलाव व् अध्ययन आज एक नवीन सामाजिक इतिहास को बयां करता है। बरार, भोपाल, धौलपुर, कोटा, ग्वालियर, होलकर,  सिंधप्रांत, लुहाना, जोधपुर, मालवांचल प्रदेश के किराडो की पहचान निकलकर आज देश- दुनिया के हर राज्य – देश में किसी न किसी कार्य उद्यम से बसाहट को दर्शित करती है ।

हमारा यह प्रयास समाज के इतिहास को जानने, समझने के साथ-साथ उन तमाम समाज बंधुओ तक पहुँचना  भी है, जिससे कि समाज की सामाजिकता, संस्कृति एवं रिश्तो- संबंधों की प्रगाढता की नवीन परिभाषा को और अधिक बेहतर रूप से समझा जा सके । यह तभी संभव है जब आपका यथेष्ट अपेक्षित प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष सहयोग, मार्गदर्शन हमें सतत प्राप्त होता रहेगा।